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Too Samajh Gayee Naa!

Nominated | Book Awards 2021 | Hindi Fiction

Too Samajh Gayee Naa!

Full Title: Too Samajh Gayee Naa!

Author: Ashok Chakradhar
Publisher: Vani Prakashan

Award Category: Hindi Fiction
About the Book: 

भारतवर्ष में कवि-सम्मेलन और मुशायरे ख़ूब होते हैं। मंच से कविता सुनाने वाले कवियों और सुनने वालों की संख्या का सानुपातिक आँकड़ा निकाला जाये तो हमारा देश विश्व में सबसे ऊपर होगा। लोग कविता सुनने के शौक़ीन हैं। ऋतुओं की मार की परवाह किये बिना रात-रातभर कविताएँ सुनते हैं, सराहते हैं और कवियों-शायरों को दिल से चाहते हैं। कवि-शायर मगन रहते हैं, लेकिन कभी-कभी कराहते हैं।

कवि-सम्मेलनों के सत् और असत् पक्ष क्या हैं, कहाँ राहत है, कहाँ चाहत है, कहाँ विरासत को आगे बढ़ाने का मज़ा है और कहाँ कवि साँसत में आ जाता है, इनकी बड़ी मार्मिक और चार्मिक अन्तःकथाएँ हैं। प्रत्येक कवि-सम्मेलन जीवन और मरण के बीच के किसी बिन्दु का कोई-न-कोई नया संस्मरण दे जाता है।

प्रसिद्धि का प्रसाद हर किसी को नहीं मिल पाता। जिनको मिलता है वे अचानक समझ नहीं पाते कि कैसे मिल गया। जिनको नहीं मिलता वे कुण्ठित हो जाते हैं कि क्यों नहीं मिला। सोचते नहीं हैं कि कैसे नहीं मिला। अब तो इन नवोदित कवियों की संख्या गुणात्मक तरीक़े से बढ़ रही है। कहाँ हैं वे लोग जो इनसे संवाद करें? मंच पर जाने वाले कवियों के पास क्या इतना समय है कि मंच पर आने की कामना रखने वाले इन कवियों को मंच पदार्पणपूर्व संवाद का एक मंच प्रदान कर सकें।

मुद्दा बहस का है। कुछ लोग मानते हैं कि कविता जन्मजात प्रतिभा से होती है। सिखायी नहीं जा सकती। काव्यात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति हर किसी के बस की बात नहीं। मेरा मानना इससे उल्टा है। जहाँ भी मौका मिलता है, मैं कहता हूँ कि इस धरती पर जितने मनुष्य हैं वे सब के सब कवि हैं, क्योंकि उनके अन्दर भावना है, कल्पना है, बुद्धि है और ज़िन्दगी का कोई-न-कोई मक़सद है। इन चार चीज़ों के अलावा कविता को और चाहिए भी क्या। प्रेम के घनीभूत क्षणों में निरक्षर, निर्बुद्ध और कलाविहीन व्यक्ति भी पल-दो पल के लिए ही सही, शायर हो जाता है। अभिव्यक्ति का कोई-न-कोई नयापन हर मनुष्य संसार को देकर जाता है। अभिव्यक्ति का नयापन ही कविता होती है। इससे आगे मेरा मानना है कि उस नयेपन को माँजा और तराशा भी जा सकता है। मेरे ख़याल से आप मुझसे सहमत होंगे कि भले ही सुर में न गाता हो पर हर मनुष्य गायक है। इसी आधार पर आप मेरी इस धारणा पर भी अपने समर्थन की मोहर लगा दीजिए कि भले ही कविता के प्रतिमानों और छन्दानुशासन का ज्ञान न रखता हो पर हर मनुष्य कवि है। जिस तरह संगीत का शास्त्रीय ज्ञान बहुत कम लोगों को हो पाता है उसी प्रकार कविता का भी। संगीत की अच्छी प्रस्तुति के लिए सुरों का न्यूनतम ज्ञान और रियाज़ ज़रूरी है इसी तरह न्यूनतम शास्त्र ज्ञान और अभ्यास से प्रस्तुति लायक कविता भी गढ़ी जा सकती है।


About the Author: 

पाँच दशक से अधिक समय हो गया, रचनाधर्मिता की यात्रा के सतत राही हैं। सन् बासठ में ग्यारह वर्ष की अल्प आयु से इन्होंने अपना कवि-सम्मेलनीय सफ़र प्रारम्भ किया। 'कहकहे' से लेकर 'रंग-तरंग तक', 'पोल टॉप टैन' से लेकर 'छोटी सी आशा' तक और 'वाह वाह' से लेकर 'चकल्लस' तक, 'मेरी बात' से लेकर पत्रिका' तक पिछले पाँच दशक से ये आकाशवाणी और टी.वी. पर मौजूद हैं। अशोक चक्रधर एक अच्छे चित्रकार हैं, श्रेष्ठ फ़िल्मकार हैं। ख़ूब सारी कथाएँ-पटकथाएँ एवं गीत इन्होंने लिखे हैं। साठ से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं। एक सम्पूर्ण मीडिया-व्यक्तित्व हैं। तीन दशक तक जामिआ मिलिआ इस्लामिया के हिन्दी केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण मण्डल (मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, भारत सरकार) एवं हिन्दी अकादमी (दिल्ली सरकार) के उपाध्यक्ष रहे। भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘पद्मश्री' की उपाधि से अलंकृत किये जा चुके हैं। कुछ अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार 'यश भारती' एवं 'विद्याभूषण सम्मान' (उत्तर प्रदेश सरकार), 'दिल्ली के गौरव', 'बाल साहित्यकार पुरस्कार', 'काका हाथरसी पुरस्कार' (दिल्ली सरकार), 'हास्य रत्न', 'व्यंग्यश्री सम्मान', 'आकाशवाणी अवार्ड', 'राष्ट्रभाषा समृद्धि सम्मान', 'त्रिनिदाद हिन्दी शिखर सम्मान', 'कैफ़ी आज़मी अवार्ड', 'साहित्य शिरोमणि, न्यूयॉर्क अवार्ड', माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी द्वारा ‘मोस्ट वेल्युएबल प्रोफेशनल (एम.वी.पी.) अवार्ड' आदि हैं। प्रो. अशोक चक्रधर नाम है अनेक प्रकार की प्रतिभाओं के एक समुच्च्य का। अलग-अलग क्षेत्रों में इन्होंने जो किया सो किया, लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हर क्षेत्र में मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित किया।


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