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Khidkiyon Se Jhankti Aankhen

Shortlisted | Book Awards 2020 | Writings for Young Adults

Khidkiyon Se Jhankti Aankhen

Author: Sudha Om Dhingra
Publisher: Shivna Prakashan

Award Category: Writings for Young Adults
About the Book: 

'खिड़कियों से झाँकती आँखें' सुधा ओम ढींगरा का सातवाँ कहानी संग्रह है। इन सभी कहानी संग्रहों को पढ़ने के बाद स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि आपकी कहानियाँ भारत और अमेरिका के बीच एक ऐसे पुल का निर्माण करती हैं, जिस पर चलकर आप इन दोनों देशों के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने बहुत बारीकी से समझ सकते हैं। आप चीज़ों को व्यापक परिदृश्य में देखते हैं और इस प्रक्रिया में आपके कई पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते हैं। यह प्रक्रिया किसी एक कहानी में नहीं बल्कि कहानी-दर-कहानी चलती रहती है। समीक्ष्य संग्रह की पहली कहानी 'खिड़कियों से झाँकती आँखें' से लेकर अंतिम कहानी 'एक नई दिशा' तक आते-आते आपकी धारणा और अधिक पक्की होती जाती है।

संग्रह की प्रतिनिधि और प्रथम कहानी 'खिड़कियों से झाँकती आँखें' अत्यंत संवेदनशील है। इस कहानी में 'आँखें' प्रतीक हैं, उन वृद्धों की, जिनकी संतानें सफलता की राह पर आगे बढ़ गईं और ये बहुत पीछे छूट गए। अब ये 'आँखें' स्नेह एवं प्रेम की एक किरण जहाँ दिखाई दे उसी से चिपक जाना चाहती हैं, लेकिन यही 'आँखें' कथा नायक डॉ. मलिक को असहज कर देती हैं क्योंकि वह इनकी सच्चाई नहीं जानता। डॉ. खान उसे इनकी सच्चाई बताते हुए कहता है -"यंग मैन,इन आँखों से डरने की ज़रूरत नहीं ,इनको दोस्ती का चश्मा चाहिए, पहना दो, चिपकना बंद कर देंगी। "( पृष्ठ -१६) डॉ. मलिक को बहुत जल्दी ये बात समझ आ जाती है और वह कहता है - "मैं जान गया कि सहारे को तलाशती ये आँखें किसी भी अजनबी में अपनापन ढूँढ़ने लगाती हैं। "( पृष्ठ -१७ )"

इस कहानी में कई आयाम हैं । एक ओर अपनी जड़ों से कटकर स्वयं को कहीं और स्थापित करना। अपनी जड़ें ज़माने और वहीं रच-बस जाने के बाद आप ही की तरह आपकी अगली पीढ़ी कहीं किसी देश में अपनी दुनिया बसा लेती है। अब आप नितांत अकेले हो जाते हैं, इसलिए एक बार पुनः अपने देश लौटने की चाह उत्पन्न होना स्वाभाविक है लेकिन तब वहाँ आपके पास कोई स्थान शेष नहीं रह जाता। यह ऐसा ही है जैसे किसी पौधे को निकाल कर कहीं और रोप दिया जाये तो कुछ समय के बाद वहाँ उस पौधे के लिए कोई स्थान शेष नहीं रह जाता । ऐसा भी हो सकता है कि उस पौधे के स्थान पर कोई और पौधा उगे एवं वृक्ष बन जाये । "डॉ. मलिक देश की धरती में लगे पौधे को उखाड़कर हमने विदेश की धरती में बो दिया। पहले पहल उसे बहुत मुश्किलों का सामना करना पढ़ा, फिर धरती और पौधे दोनों ने एक दूसरे को स्वीकार कर लिया "( पृष्ठ -२१ ) "जब पौधा वृक्ष बन गया तो हमने उसे उखाड़ कर फिर पुरानी धरती में लगाने ले गए। जिन रिश्तों के लिए पौधा विदेश में वृक्ष बना, उन्हीं रिश्तों ने स्वार्थ की ऐसी आँधी चलाई की वृक्ष के सारे पत्ते झड़ गए, टुंड-मुंड हो गया वह। पुरानी धरती और टुंड-मुंड हुए वृक्ष ,दोनों ने एक दूसरे को स्वीकार नहीं किया और रोप दिया हमने विदेश की धरती पर वह वृक्ष एक बार फिर। इस धरती ने उसे पहचान लिया और सीने से लगा लिया। "( पृष्ठ -२१ )

सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में यह बात बार-बार उभर कर सामने आती है कि स्वदेश में रहने से सब बहुत अच्छे और विदेश में रहने से बुरे नहीं बन जाते। न ही उन संस्कारों को भूलते हैं जो उन्हें परिवार और समाज से मिले और जो भूल जाते हैं या स्वार्थी बन जाते हैं, ऐसे अपवाद कहीं भी हो सकते हैं। किसी के व्यक्तित्त्व निर्माण में देश विशेष का प्रभाव तो अवश्यंभावी है, लेकिन और भी अनेक कारक हो सकते हैं । समीक्ष्य संग्रह की दूसरी कहानी 'वसूली' में ऐसे ही एक विषय को उठाया गया है । 'वसूली' कहानी सत्तर के दशक से नब्बे के दशक तक जाती है, इसमें लेखिका ने हरि और सुलभा के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है कि प्रवासी भारतीय ; अपनी भारतीयता, देश और परिवार से कितना लगाव रखते हैं, जबकि भारत में रहने वाले कितने भारतीय ऐसे हैं जिन के लिए उनका स्वार्थ सर्वोपरि है। शंकर और उमा को उस मनोवृत्ति के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। हरि मोहन अमेरिका में रहकर भी अपने परिवार को सुखी और प्रसन्न देखना चाहता है। विदेश जाकर बसने के पीछे भी यही कारण था लेकिन हरि के लिए जो सच्चाई थी, शंकर के लिए वह निरी भावुकता । शंकर के शब्दों में " हरि, तुम शुरू से ही भावुक थे, विदेश जाकर तो भावनात्मक बेवकूफ बन गए हो। "हरि के लिए शंकर का यह व्यवहार आश्चर्यजनक था, तभी तो वह कहता है- " कहाँ गई आपकी मर्यादा ! कहाँ गया आपका संस्कार ! विदेश में तो मैं रहता हूँ और समुद्र का खारापन आपकी आँखों पर छा गया है। (पृष्ठ-26)

हरि भारत में जन्मा, छह भाई-बहनों के बीच अत्यंत गरीबी में पला-बढ़ा। बहुत मेहनत करके पढ़ाई की संभवतः इसलिए उसका व्यक्तित्व एक भावुक और उदार व्यक्ति के रूप में निर्मित हुआ जबकि उन्हीं परिस्थितियों के बीच पले-बढ़े उसके बड़े भाई शंकर का व्यक्तित्व ठीक उलट दिखाई देता है। जबकि बचपन में वह भी हरि की ही तरह अत्यंत संवेदशील था। ऐसे में क्या इसे मात्र व्यक्तिगत भिन्नता के रूप में देखा जा सकता है या संगत भी एक कारक रूप में रही होगी। लेखिका ने इस और संकेत किया है। शंकर के व्यवहार का उसके परिवार पर जो असर है, वह उसके समूचे परिवार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। एक माँ का अपने ही बेटे से डरना और अपनी व्यथा को इस तरह व्यक्त करना "उमा उसे भड़काती रहती है, अब बार-बार एक ही बात करता है, मैं, मेरी पत्नी मेरा परिवार है और बाकी सब यानी बहन-भाई आपकी गृहस्थी हैं।" (पृष्ठ-27) वह समझ नहीं पाती उससे क्या गलती हो गई, वह बेटा जो सारे विश्व को अपना परिवार समझता था, अब सबको अलग कैसे समझने लगा।


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