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काला नाग

Nominated | Book Awards 2021 | Hindi Fiction

काला नाग

Full Title: काला नाग

Author: सुरें द्र मोहन पाठक
Publisher: Penguin Random House India

Award Category: Hindi Fiction
About the Book: 

सुरेंद्र मोहन पाठक नजतना अपनी निलर कहाननयो ीं के नलए जाने जाते हैं, उतना ही नलखने के अींदाज के नलए
भी। काला नाग उनके निय नवषय, भृष्ट पुनलस अफ़सर पर आधाररत है। इींस्पेक्टर भारकर एक बेईमान पुनलस
अफ़सर है। उसकी आूँख में बेहद जहीन व् ईमानदार इींस्पैक्टर गोरे खटकता रहता है जो उसकी काली करतूतो ीं
-- ड्रग्स और ररश्वत पर नजर रखे रखता है। एक नदन भारकर गोरे का बडी चालाकी से खून कर देता है
और ऐसे नदखता है नक वो भ्रष्ट था और इसनलए उसने अपनी जान ले ली। साथ ही साथ वह अपने सारे
इलजाम उसपर थोप देता है। लेनकन उसे पता नही ीं होता नक गोरे उस समय एक लडकी के सींग था जो छु प
गयी थी। गोरे अपनी सज्जनता के नलए जाना जाता था तो उसके कलीग्ज ये मानने से इींकार कर देते हैं नक वह
आत्महत्या कर सकता था। धीरे-धीरे राज नक गुत्थी खुलनी शुरू होती है और सच्चाई सामने आती है।
पाठक साहब का नलखा यह बेहतरीन निलर धीरे-धीरे पाठक को ऐसा उलझता है नक वह बस पन्ने पलटता ही
चला जाता है।


About the Author: 

Surendra Mohan Pathak was born on 19 February 1940 in Khemkaran, Punjab. After graduating in Science, he began to work at the Indian Telephone Industries Ltd. By the time he grew up, he had already read many national and international writers and begun translating the novels of Ian Fleming, Mario Puzo and James Hadley Chase, after which he began his own writing.
His most popular novels were Asafal Abhiyaan and Khaali Vaar, which took Pathak to the very zenith of fame. Since then, he has never looked back. His novel, Painsath Lakh ki Dakaiti was also published in English and made news for selling hundreds of millions of copies.


Excerpt: 

कई क्षण की खामोशी के बाद झालानी दबे स्वर से बोला – “कु लकु णी साहब, वैसे तो आज के दौर की इस
फानी दुननया में जो न हो जाए थोडा है, लेनकन मेरा नदल गवाही नही ीं देता नक एसआई अननल गोरे ने
खुदकु शी की। मैं अननल गोरे को जाती तौर से जानता था, वो एक जोशीला, नजयाला नौजवान था जो भरपूर
नजन्दगी जीने में एतबार रखता था, जो बाींकपन से जीता था और जब नौबत आती तो बाींकपन से ही मौत को
गले लगा कर नदखाता, खुदकु शी जैसी बुजनदली की तवक्को मैं उससे हरनगज नही ीं कर सकता था। ऐसी
नजींदानदली हर नकसी में कहाीं पाई जाती है जो कहलाती हो – ‘मुझे आता है कौसर, हश्र गाहो ीं से गुजर जाना,
मैं इीं सा हूँ मेरी तौहीन है घुट-घुट के मर जाना’।”


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