एक रुका हुआ फैसला
Nominated | Book Awards 2021 | Hindi Non-fiction
एक रुका हुआ फैसला
भाकर कुमार िम ारा िलखत एक का हुआ फैसला अयोया ववाद के आखर चालीस
दन का एक जीवंत दतावेज है जो आमलोग क भाषा म सरल और सहज तरके से इस
फैसले का वेषण करता है। इस पुतक म राम जमभूिम- बाबर मजद ववाद, उसक
पृभूिम, इितहास और उससे जुड़ अय घटनाओं और पा पर भी वचार कया गया है। यह
कताब हमारे देश क जटल राजनीितक और याियक यवथा का भी एक िच तुत करती
है और बताती है क कैसे यह यवथा धमिनरपे तरके से काम करती है। बारह अयाय म
फैली इस पुतक म ववाद के पकार, जज और वकल के बारे म भी वतार से चचा क
गई है।
इस पुतक म अयोया ववाद पर सुीम कोट म चली चालीस दन क सुनवाई के साथ ह
अखाड़ का इितहास, फैसले के टलने क वजह, झांसी क रानी, रामलला के वंशज, राम मंदर
आदोलन म िसख का योदगान, तुलसीदास क रचनाओं पर ववाद इयाद का वणन है जो
इस कताब को एक आवयक पठन सामी बना देता है। इस पुतक के परिश म अदालत म
चली चालीस दन क घटनाओं का बंदुवार ववरण भी दया गया है और ये भी बताया गया है
क पकार के वकल ने कस दन या-या कहा और मीडया म उनक कौन सी दलील या
उनके वय कैसे सनसनी बनाकर पेश कए जाते रहे।
यह कताब उन पाठक के िलए ज़र है जो समकालीन भारत के एक महवपूण या कह क
सवािधक महवपूण अदालती फैसले के बारे म सपूण जानकार हािसल करना चाहते ह।
मूलत: गोपालगंज (बिहार) के रहने वाले प्रभाकर कुमार मिश्र एक टीवी पत्रकार हैं और करीब पंद्रह सालों से सुप्रीम कोर्ट की ख़बरों की रिपोर्टिंग करते आ रहे हैं। इस दौरान वे अयोध्या विवाद पर आए फैसले समेत सुप्रीम कोर्ट के कई अन्य महत्वपूर्ण फैसलों के गवाह रहे हैं। वे नियमित टीवी रिपोर्टिंग के अलावा अलग-अलग अखबारों और पत्रिकाओं में कानूनी और संवैधानिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय, दक्षिण परिसर के पत्रकारिता विभाग में अतिथि अध्यापक के तौर पर भी जुड़े हुए हैं। प्रभाकर कुमार मिश्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है। संप्रति वे न्यूज़ 24 में असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं।
कोट ने िलखा है क बाबर मजद 1528 म बनी थी और 1856-57 तक उसका पोजेशन यानी कज़ा और
नमाज़ को लेकर कोई जानकार नहं दख रह है। यानी जब टश शासक ने वहाँ रेिलंग लगवाई और
ववादत थल को बाहर (इनर कोटयाड) और भीतर हसे(आउटर कोटयाड) म वभाजत कया, तो 325
साल के इस कालखंड म मुलम पके पास इस बात का कोई साय नहं है जससे यह साबत हो सके क
ववादत थल उनके कज़ा म था और इस अविध के दौरान उहने वहाँ नमाज़पढ़ थी।
एक संयोग यह भी है क जस कालखंड म मुलम पके पास अपने दावे को साबत करने का सबूत नहं
था, वह मुगलकाल था और पूर हुकूमत मुलम शासक क थी।
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