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Galiyon Ke Shahzaade

VoW 2020 / Sessions / November 21 / Galiyon Ke Shahzaade

VoW 2020 | November 21 – 10:30 am to 11:30 am | Savoy Writers' Bar | Hindi Sahitya

Galiyon Ke Shahzaade

Nasera Sharma in conversation with Dr Jaiwanti Dimri

Galiyon Ke Shahzaade

Report

Session 22, HI–4 Galiyon ke Shahzaade

गलियों के शहजादे
“गलियों के शहजादे” एक कहानी संग्रह है, 144 पन्नों की एक किताब, जिसके अंदर कुल 12 कहानियों को संग्रहित किया गया है, जिनमें से “गलियों के शहजादे” किताब की बारहवीं व अंतिम कहानी है। ये सभी कहानियां बाल संघर्ष, विषमताएँ, विपदाएँ और अंत में समाधान पर आधारित हैं। इसे बाल लेखन पुरस्कार से सम्मानित अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नासिरा शर्मा ने लिखा है। लेखिका कहानी के साथ-साथ उपन्यास, रिपोर्ताज आदि भी लिखती हैं। लेखिका बहुभाषी हैं, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू व ईरान में रहकर फारसी भाषा का भी अध्ययन कर चुकी हैं। लेकिन इन सबसे परे उनके पास एक ज़मीनी अनुभव है, जिसे वह आज वैली ऑफ वर्ड्स द्वारा आयोजित कला एवं साहित्य उत्सव के दर्शकों के साथ शेयर कर रहीं थीं।

लगभग 2 घंटे के इस सेशन में बच्चों से जुड़े तमाम मुद्दों पर बातचीत की गई और बीच-बीच में सामाजिक सरोकार की भी अन्य कई बातें की गई । जब साक्षात्कर्ती डॉक्टर जयवंती दिमरी ने पूछा कि कहानी लिखने का मकसद क्या है? तो नासिरा शर्मा का बड़ा ही सुंदर सा जवाब आया कि कम से कम 2 लोगों के अंदर भी बच्चों के प्रति संवेदना जग जाए! इसलिए कहानी लिखी गई हैं। गंगा-जमुना तहजीब पर किए गए प्रश्न में नासिरा शर्मा ने बताया “बच्चे तो जानते नहीं हिंदू मुस्लिम कौन हैं।”
संपूर्ण सेशन के दौरान कई जीवन से जुड़ो हुए सामाजिक मुद्दों पर भी बातचीत की गई जिसमें उन्होंने एक अनुभव भी शेयर किया कि पानी की समस्या पर बात करने के लिए उन्होंने कई मेयर व मंत्रियों को पत्र लिखे थे एक मेयर के अलावा किसी ने उन्हें समय नहीं दिया लेकिन बाद में अब्दुल कलाम ने खुद 20 मिनट का समय देकर उनसे पानी की समस्या पर बातचीत की थी, यह अपने आप में एक बड़ी मिसाल है। अंत में हिंदी के पढ़े ना जाने पर किए गए सवाल में उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि हिंदी में पढ़ा नहीं जा रहा है, खूब पढ़ा जा रहा है। अंत में लेखकों की संवेदनशीलता पर बात करते हुए कहा गया कि देश में कोई भी कानून बनाने में कम से कम एक लेखक की सहायता जरूर ली जानी चाहिए ताकि संवेदनात्मक तरीके से जमीनी सुधारपरक कानून का गठन हो सके।