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यात्रा सानहत्य

VoW 2020 | November 21 – 4:00 pm to 4:45 pm | Savoy Post Office | Hindi Sahitya

यात्रा सानहत्य

लनलत मोहन रयाल, प्रवीण झा, डॉ सत्यकाम

यात्रा सानहत्य

Introduction

Yatra Sahitya: Travel Literature

Lalit Mohan Rayal, Praveen Jha, Dr Satya Kam

Report

Session-40, HI-7, यात्रा साहित्य
ललित मोहन रयाल, प्रवीण झा, डॅा सत्यकाम।

वैलीऑफ वर्ड्ज़, साहित्य फ़ेस्टिवल 20 से 22नवंबर तक ऑनलाइन माध्यम सेआयोजित किया गया है। इस फ़ेस्टिवल में अनेकों साहित्यिक विषयों पर पहले औरदूसरे दिन गम्भीर चिंतन किया गया। इस वर्ष कोविड 19 के कारण सभी प्रकार केक्रियाकलाप ऑनलाइन किए जा रहे हैं, फलस्वरूप फ़ेस्टिवल की प्रदर्शनी, साहित्य स्टाल सेवोय होटेल, मसूरी माल रोड दर्शकों को आधिकारिक वेबसाईट परही उपलब्ध कराए जा रहे हैं। ऐसा कहा जा सकता है की इस वर्ष यह साहित्यिकउत्सव रचनात्मकता के एक नए स्तर को छू रहा है।
फेस्टिवल की श्रृंखलामें आगे बढ़ते हुए, आज एक अत्यंत रुचिकर सत्र: यात्रा साहित्य पर विचारविमर्श, प्रसिद्ध साहित्यविद् डॉ सत्यकाम, ललित मोहन रायाल तथाप्रवीण झाद्वारा सम्पन्न किया गया। सत्र के आरंभ में यात्रा साहित्य कि परिभाषाको बताते हुए सत्यकामजी ने बताया की किस प्रकार यात्रा ही साहित्य काबिंदु है। चाहे रामायण में आरण्य जीवन का वर्णन हो या बौद्धकालीन साहित्य मेंयात्रा कर बौद्ध धर्म के विस्तार का विवरण हो, यात्रा साहित्य ही हमारेस्वर्णिम इतिहास का दर्पण रहा है।अपने विचारों को आगे प्रकट करते हुए ललितरयालजी ने भी बताया कि किस प्रकार प्रमाणस्वरूप हमारी अपेक्षा विदेशीसाहित्यकारों ने ग्रंथों या पांडुलिपियों का संग्रह बेहतर किया है। आख्यान तोमिले परन्तु संग्रह करने की प्रवृति ना होने के कारणतथा अनेकोंआक्रांताओं के फलस्वरूप हमारी धरोहर विलुप्त हुई है। उन्होंने संग्रह ना करपाने की स्थिति बनने का एक सबसे एहम कारण शिक्षा का जातियों में विभाजनतथा स्त्रियों को ना पढ़ाने की मानसिकता को बताया। आधुनिक काल मेंसंग्रहणता के बारे में बताते हुए सत्यकामजी ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तथाउनके मंडल के लोगों को श्रेय दिया।
सत्र में आगे बढ़ते हुए प्रवीण झाजी द्वारा यह पूछे जाने पर कि साधनसुविधा बढ़ने से यात्रा का समय संक्षिप्त हुआ तथा इसके फलस्वरूप यात्रावृतांत पर पड़ने वाले प्रभाव क्या हैं? इसपर अपने विचार व्यक्त करते हुएसत्यकामजी ने कहा कि व्यक्ति शरीर से ही नहीं , विचारों से भी भ्रमण करताहै। इसका उदाहरण स्वामी विवेकानंद जी द्वारा लिखित “शून्य की यात्रा” कोदेते हुए उन्होंने यह भी कहा कि वैचारिक यात्रा सीमा रहित है। यात्रावृतांत किस प्रकार का होना चाहिए, इस पर बातचीत करते हुए ललित मोहन रयालजीने बताया की यात्रा साहित्य कहीं बिंदुवार रोजनाम्चा ना बन जाए इसपर विशेषध्यान रखना चाहिए। यात्रा साहित्य को जीवंत और रुचिकर बनाए रखने के लिए यहअत्यंत आवश्यक है कि इसका वृतांत सांस्कृतिक विनिमय लिए हो, कुछ विशेष अनुभवतथा नवीन खोज पर आधारित हो। सत्यकाम जी ने भी सोफिया के अनुभवों पर आधारितअपनी पुस्तक का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे दूसरी संस्कृति से प्रभावितविचारो को, अपनी संस्कृति का प्रभाव वहां खोजें जाने को तथा दोनों हीसंस्कृति की समानताओं को शब्दों में पिरो कर यात्रा साहित्य को अत्यंतरुचिकर और जीवंत बनाया जा सकता है।
सत्र के अंत में यात्रा साहित्य के भविष्य को बताते हुए सत्यकामजी ने कहा कि इसका भविष्य अति उज्ज्वल है, क्योंकि यात्रा साहित्य मेंसहजता, जीवंतता होती है। इस वजह से पाठकों की दिलचस्पी सदैव बनी रहेगी।गुलशन नंदा तथा देवकीनंदन खत्री जैसे प्रभावशाली साहित्यकारों की लेखन शैलीका विवरण करते हुए उनके लिखित साहित्यों को खूब सराहा गया। यात्रा साहित्यके भविष्य पर अपनी राय देते हुए ललित मोहन रयाल जी ने कहा कि अन्य लेखनप्रायः काल्पनिक होते है, परन्तु यात्रा साहित्य में लेखक की कल्पनाशीलतायथार्थ पर आधारित होती है, इसी कारण पाठक अध्ययन के दौरान खुद को लेखक केस्थान पर पाता है।

Swarnim Santosh