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देश-नवदेश में हन्दी : (प्रवासी लेखक)

VoW 2020 | November 21 – 5:00 pm to 6:00 pm | Savoy State Room | Hindi Sahitya

देश-नवदेश में हन्दी : (प्रवासी लेखक)

शैलजा सक्सेना (कनाडा), अनूप भार्ाव (अमरीका), तेजेन्र शमाा(यू॰ के ॰), श्री सुशील उपाध्याय, अननल जोशी

देश-नवदेश में हन्दी : (प्रवासी लेखक)

Introduction

Desh-Videsh Mein Hindi: (Pravaasi Lekhak)

Shailja Saksena (Canada), Anoop Bhargav (America), Tejendra Sharma (UK), Sushil Upadhyay with Anil Joshi

Report

39 HI-6, देश विदेश में हिंदी
हिंदी का हमारे देश को एकजुट बांधे रखने में बहुत बड़ा योगदान है। समय के साथ हिंदी ने खुद से कई अन्य भाषाओं को पिरोया और जोड़ा है। हिंदी सिर्फ हमारे देश तक ही सिमित नहीं है बल्कि विदेशों में भी जो प्रवासी भारतीय हैंउनकेऔर उनके आसपास के लोगों के दिल में है। हिंदी एकमात्र ऐसी भाषा है जो प्रवासी भारतीयों को एक दूसरे से जोड़े हुए है, चाहेवो भारतके किसी भी कोने से क्यों न हो। वैली ऑफ़ वर्ड्स की परिचर्चा में हुए इस सत्र में श्री अनूप भार्गव, शैलजा सक्सेना, तेजेन्द्र शर्मा और डॉ. अनिल प्रकाश जोशीने भाग लिया और डॉ. सुशील उपाध्याय ने मेज़बानी की।
हिंदी हमारे देश से जुड़कर ही विदेशों में पहुंची है। एक दशक में देश से लोग अपनी सेवा देने अमेरिकाएवं अन्य जगह जाने लगे। इंग्लैंड में हिंदी के कदम कुछ ज्यादा पड़े हैं क्योंकि अमेरिकासे ज्यादा लोग यहाँ साहित्य मेंरूचि रखते हैं। जहाँ अमेरिकामें भारतीय डॉक्टर, इंजीनियर जैसे नौकरी करने गए वहां इंग्लैंड में लोग साहित्य का विस्तार करने पहुंचे। 25-30 वर्ष का नागरिक जहाँ अपने सपनों के साथ किसी भी देश में जाता है वह अपने देश के प्रभाव और देश को भूल नहीं पाता, उसे दशकों तक अपनी यादों में बनाये रखता है। अमेरिका, कनाडा जैसे देशों में साहित्यकार, लेखकही सिर्फ नहीं लिखते वहां लोग ज्यादातर इन क्षेत्रों से बाहरवाले लेखक के रूप में जाने जाते हैं। हिंदी जानने वाले ही हिंदी लिखते और पढ़ते हैं। जब हिंदी शिक्षण की बारी आती है तो वह एकअतिरिक्त(ऑप्शनल) विषय का ऑप्शन बनकर रह जाता है, क्योंकि हिंदी वेघर पर सीख सकते हैं, हिंदी के बजाय वेफ्रेंच, स्पेनिश और रुसी भाषा के प्रति ज्यादा ध्यान देते हैं। हिंदी वहां के मेनस्ट्रीम विषयों में से नहीं है। 1960 के दशक के बाद कनाडा में हिंदी का प्रभाव बढ़ने लगा। लेखकों की स्थिति बहुआयामी है क्योंकि किसी भी व्यक्ति का दिमाग उसकी जीवन कीपरिस्थितियों के साथ बदल जाता है। बस साथ रहती है तो उसकी संवेदनाएं जो उससे अपने देश और मिट्टीसे बांधे रखती हैं। अपने गाँवोंया शहर से निकलकर थोड़े दूर तक जाने वाला व्यक्ति भी खुदको प्रवासी मानता है। अपने लेखनी में वह अपने मिट्टी, शहर या गांव की यादों को शब्दों में पिरोता है।
विदेश में रह रहे प्रवासी भारतीय अगर हिंदी को खुद से भावनात्मक रूप से जोड़ लें तो हिंदी को किसी भी देश में स्थापित होने में देरी नहीं होगी। भारतीय जिस भी देश में जाते हैं उनके अनुरूप खुद को बना लेते हैं जब याद अपने देश अपने घर की आती है तब हिंदी उनके संवेदनाओं से निकलकर आती है। हिंदी को जितना भारतीयों ने विदेश में नहीं पहुँचाया है उससे कहीं ज्यादा भारतीय फिल्मों और गानों ने पहुँचाया है। हिंदी गानों में आज भी वह जान है जो किसी भी व्यक्ति को थिरकने से नहीं रोक सकता। बॉलीवुड ने जितना विदेश का चेहरा हमें दिखाया है विदेश उससे कहीं ज्यादा अलग और भिन्न है।उन्हींबॉलीवुड फिल्मों ने ही भारत के त्यौहार,संस्कृति आदि को विदेशों में परिचित कराया है और एक दूसरे को जानने का पुल भी बना है। बॉलीवुड हिंदी को बाहरफ़ैलाने में जितना सहायक रहा है उतना हिंदी साहित्य नहीं है। साहित्य या बॉलीवुड जिस तरह से विदेश के रंग रूप को दर्शाते हैं वह उससे कहीं अलग है। अगर वह उनके संस्कृति, साहित्य को एक नए नज़रिये से दिखाए जैसे वह असल में हैं तो हिंदी साहित्य को विदेशों में स्थापित होने से कोई नहीं रोक सकता।