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Khanzada

 

Longlisted | Book Awards 2022 | Hindi Fiction

Khanzada

Full Title: Khanzada

Author: Bhagwandass Morwal
Publisher: Rajkamal Prakashan

Award Category: Hindi Fiction
About the Book: 

‘काला पहाड़’ और ‘रेत’ जैसे उपन्यासों द्वारा भगवानदास मोरवाल ने हिंदी में एक ऐसे लेखक की छवि बनाई है जो अपनी कथा-वीथियाँ समाज, देश और संस्कृति के तथ्यात्मक भूगोल के बीच से निकालता है। आम तौर पर वे ऐसे विषयों को चुनते हैं जिन्हें सिर्फ कल्पना के सहारे कहानी नहीं बनाया जा सकता, उनका गारा-माटी श्रमसाध्य शोध और खोजबीन से तैयार होता है। मेवात उनके लेखकीय और नागरिक सरोकारों का केंद्र रहा है. अपनी इस मिट्टी की संस्कृति, इतिहास और उसके समाजार्थिक पक्षों पर उन्होंने बार-बार निगाह डाली है। ‘खानजादा’ उपन्यास इसकी अगली कड़ी है। यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह उन अदृश्य तथ्यों की निर्ममता से पड़ताल करता है जो हमारी आज की राष्ट्रीय br>चिंताओं से सीधे जुड़े हुए हैं। भारत में तुगलक, सादात, लोदी और मुगलों द्वारा चौदहवीं सदी के मध्य से मेवातियों पर किए गए अत्याचारों और देहली के निकट मेवात में मची तबाही की दस्तावेजी प्रस्तुति करते हुए यह उपन्यास मेवातियों की उन शौर्य-गाथाओं को भी सामने लाता है जिनका इतिहास में बहुत उल्लेख नहीं हुआ है। प्रसंगवश इसमें हमें कुछ ऐसे उद्घाटनकारी सूत्र भी मिलते हैं जो इतिहास की तोड़-मरोड़ से त्रस्त हमारे वर्तमान को भी कुछ br>राहत दे सकते हैं। मसलन बाबर और उसका भारत आना। हिन्दू अस्मिता का उस वक्त के मुस्लिम आक्रान्ताओं से क्या रिश्ता बनता था, धर्म-परिवर्तन की प्रकृति और उद्देश्य क्या थे और इस प्रक्रिया से वह भारत कैसे बना जिसे गंगा-जमुनी तहजीब कहा गया, इसके भी कुछ संकेत इस उपन्यास में मिलते हैं। इतिहास, कल्पना और किस्सागोई की दिलचस्प संगत में पगा यह उपन्यास पाठक को इतिहास की उन उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर लाकर छोड़ देता है, जिससे वह अब तक पूरी तरह अनजान था.


About the Author: 

जन्म: 23 जनवरी, 1960 नगीना, जिला-मेवात (हरियाणा)। शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी) एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा। प्रकाशित कृतियाँ: काला पहाड़, बाबल तेरा देस में, रेत (उर्दू में अनुवाद), नरक मसीहा (मराठी में अनुवाद), हलाला (उर्दू व अंग्रेजी में अनुवाद), सुर बंजारन, वंचना तथा शकुंतिका, ख़ानज़ादा (उपन्यास); सिला हुआ आदमी, सूर्यास्त से पहले, अस्सी मॉडल उर्फ़ सूबेदार, सीढ़ियाँ, माँ और उसका देवता, लक्ष्मण-रेखा, दस प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानी-संग्रह); पकी जेठ का गुलमोहर (स्मृति-कथा); लेखक का मन (वैचारिकी); दोपहरी चुप है (कविता); बच्चों के लिए कलयुगी पंचायत एवं अन्य दो पुस्तकों का सम्पादन। सम्मान: डॉ. अम्बेडकर सम्मान (1985), साहित्यकार सम्मान (2004), हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार; कथाक्रम सम्मान (2006), अन्तरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान (2009) सहित कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित।.


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