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वैलेंटाइन बाबा (Valentine Baba)

Nominated | Book Awards 2019 | Children's/Young Adult Writing

वैलेंटाइन बाबा (Valentine Baba)

Author: शशि कान्त मिश्र (Shashikant Mishra)
Publisher: Rajkamal Prakashan

Award Category: Children's/Young Adult Writing

About the Book: 

बागी बलिया का कडक़ लौंडा शिवेश वैलेंटाइन बाबा की मोहब्बत की मल्टी डायमेंशनल कम्पनी का फुल टाइम इम्प्लॉई है, जिसका एकमात्र धर्म है ‘काम’। ठीक इसके उलट है उसके बचपन का जिगरी यार, दिलदार, नाक की सीध में चलने वाला—मनीष, जिसकी सुबह है—सुजाता जिसका शाम है—सुजाता! जो ठीकठाक मॉडर्न है, थोड़ी स्टाइलिस्ट है, नई जबान में सेक्सी है, मस्ती की भाषा में बिन्दास है; लेकिन बलिया की यह ठेठ देसी लडक़ी कलेजे से ऐसी मजबूत है कि अगर कोई उसे चिडिय़ा समझकर चारा चुगाने की कोशिश करने आगे बढ़े तो उसके इरादे का वह कचूमर बनाकर रख देती है। सुजाता की रूममेट है मोहिनी, जिसका दिल मोहब्बत के मीनाबाजार से बुरी तरह बेजार हो चुका है। लव-सव-इश्क-विश्क की फिलॉसफी को ठहाके में उड़ाती वह अक्सरहाँ कहने लगी है—जिसका जितना मोटा पर्स, वो उतना बड़ा आशिक! सबकी जिन्दगी में कोई एक मकसद है, सबको कुछ-न-कुछ मिलता है, लेकिन क्या जिन्दगी उन्हें वही देती है, जो वे चाहते थे? चार नौजवान दिलों की हालबयानी है यह उपन्यास—वैलेंटाइन बाबा! ढाई आखर वाले प्यार और वन नाइट स्टैंड वाले लस्ट की सोच का टकराव आखिर किस मोड़ पर ले जाकर छोड़ेगा आपको, उपन्यास के आखिरी पन्ने तक कायम रहेगा यह रहस्य! माना कि लाइफ में बहुत फाइट है, सिचुएशन हर जगह, हर मोर्चे पर टाइट है तो क्या हुआ, दिल भी तो है! यकीनन, शशिकांत मिश्र का यह दूसरा उपन्यास बेलगाम बाजार की धुन पर ठुमकते हरेक दिल की ईसीजी रिपोर्ट है, इसे पढऩा आईने के सामने होना है, जाने क्या आपको अपने-सा दिख जाए...!

About the Author: 

पिछले 13 सालों से मीडिया में सक्रिय। आठ साल से स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ में, इससे पहले इंडिया टीवी में कार्यरत। बिहार के कटिहार जि़ले में पला-बढ़ा । अर्थशास्त्र में स्नातक और हिन्दी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की डिग्री है, लेकिन बस डिग्री। बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई से छत्तीस का आँकड़ा रहा है। आवारागर्दी में ज़माने की सैर करता रहता हूँ और वहीं जि़न्दगी के मायने तलाशता हूँ। ज़्यादातर बिहारी स्टूडेंट की तरह लालबत्ती की $ख्वाहिश लिए यूपीएससी वालों के मक्का मदीना मुखर्जी नगर पहुँच गया था। लालबत्ती तो मिली नहीं, अलबत्ता ‘नॉन रेजि़डेंट बिहारी’ के लिए भरपूर ‘मसाला’ मिल गया! वह पहला उपन्यास था। लोगों ने कहा, वाह-वाह तो दूसरा लिख डाला—वैलेंटाइन बाबा। कुछ और भी लिख रहा हूँ।

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