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भ्रम और निरसन (Bhram Aur Nirsan)

Nominated | Book Awards 2019 | Translated into Hindi, Translations

भ्रम और निरसन (Bhram Aur Nirsan)

Author: नरेन्द्र दाभोलकर (Narendra Dabholkar)
Publisher: Rajkamal Prakashan

Award Category: Translated into Hindi, Translations

About the Book: 

नरेन्द्र दाभोलकर का जिन्दगी के सारे चिन्तन और सामाजिक सुधारों में यही प्रयास था कि इनसान विवेकवादी बने। उनका किसी जाति-धर्म-वर्ण के प्रति विद्रोह नहीं था। लेकिन षड्यंत्रकारी राजनीति के चलते अपनी सत्ता की कुर्सियों, धर्माडम्बरी गढ़ों को बनाए रखने के लिए उन्हें हिन्दू विरोधी करार देने की कोशिश की गई और कट्टर हिन्दुओं के धार्मिक अन्धविश्वासों के चलते एक सुधारक का खून किया गया। एक सामान्य बात बहुत अहम है, वह यह कि विवेकवादी बनने से हमारा लाभ होता है या हानि इसे सोचें। अगर हमें यह लगे कि हमारा लाभ होता है तो उस रास्ते पर चलें। दूसरी बात यह भी याद रखें कि धर्माडम्बरी, पाखंडी बाबा तथा झूठ का सहारा लेनेवाले व्यक्ति का अविवेक उसे स्वार्थी बनाकर निजी लाभ का मार्ग बता देता है, अर्थात् उसमें उसका लाभ होता है और उसकी नजर से उस लाभ को पाना सही भी लगता है; लेकिन उसके पाखंड, झूठ के झाँसे से हमें हमारा विवेक बचा सकता है। ‘भ्रम और निरसन’ किताब इसी विवेकवाद को पुख्ता करती है। हमारी आँखों को खोल देती है और हमें लगने लगता है कि भाई आज तक हमने कितनी गलत धारणाओं के साथ जिन्दगी जी है। मन में पैदा होनेवाला यह अपराधबोध ही विवेकवादी रास्तों पर जाने की प्राथमिक पहल है। सोलह से पच्चीस की अवस्था में मनुष्य का मन एक तो श्रद्धाशील बन जाता है या बुद्धिवादी बन जाता है। बहुत सारे लोग समझौतावादी बन जाते हैं। इसीलिए अन्धविश्वास का त्याग करने के जरूरी प्रयास कॉलेजों के युवक-युवतियों में ही होने चाहिए। क्षण-प्रतिक्षण तांत्रिक, गुरु अथवा ईश्वर के पास जाने की आदत बन गई कि पुरुषार्थ खत्म हो जाता यह उन्हें समझना चाहिए या समझाना पड़़ेगा। भारतीय जनमानस और देश को लग चुका अन्धविश्वास का यह खग्रास ग्रहण श्री नरेन्द्र्र दाभोलकर जी के प्रयासों से थोड़ा-बहुत भी कम हो गया तो भी लाभप्रद हो सकता है। वैज्ञानिक खोजबीन अपनी चरमसीमा को छू रही है। ऐसे दौर में अन्धविश्वासों का चश्मा आँखों पर लगाकर लडख़ड़ाते कदम उठाने में कौन सी अक्लमन्दी है? —नारायण गणेश गोरे

About the Author: 

शिक्षा : एम.बी.बी.एस.।
कार्य-संघर्ष व उपलब्धि : सन् 1982 में अंधविश्वास उन्मूलन कार्य का प्रारंभ। 1989 में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना। आजन्म समिति के कार्याध्यक्ष रहे। महाराष्ट्र में समिति की 180 शाखाएँ कार्यरत हैं।
अंधविश्वास उन्मूलन विषय पर दर्जन-भर पुस्तकों का लेखन। पुस्तकों के निरंतर नए संस्करण प्रकाशित। पुस्तकों को अनेक पुरस्कार। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन करते रहे और मीडिया में प्रतिक्रिया, प्रतिवाद, साक्षात्कार, संवाद लगातार प्रकाशित होते रहे। बुवाबाजी, भानमति, चमत्कार, ज्योतिष, अनिष्ट रूढि़-परंपरा के खिलाफ निरंतर संघर्ष। विवेकवादी विचारों का प्रचार-प्रसार कार्य। विज्ञाननिष्ठ समाज-निर्माण का रचनात्मक कार्य। बारह वर्ष तक मराठी साप्ताहिक 'साधना' का संपादन। सन् 2006 में 'दशक श्रेष्ठ कार्यकर्ता' का महाराष्ट्र फाउंडेशन का सम्मान। सम्मान के रूप में दस लाख रुपये एवं गौरवचिह्न। पुरस्कार की राशि महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति को समर्पित। 20 अगस्त, 2013 को अज्ञात तत्त्वों द्वारा गोली मारकर हत्या। हत्या के तुरंत बाद उनकी बरसों विलंबित माँग की पूर्ति के रूप में महाराष्ट्र अंधविश्वास उन्मूलन कानून पारित। ऐसा कानून पारित करनेवाला महाराष्ट्र देश का सर्वप्रथम राज्य। समग्र जीवन संघर्षशील। भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत 'पद्मश्री' से सम्मानित।

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