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बदलता गाँव, बदलता देहात (Badalta Gaon, Badalta Dehat)

Shortlisted | Book Awards 2019 | Hindi Non-Fiction

बदलता गाँव, बदलता देहात (Badalta Gaon, Badalta Dehat)

Full Title: नयी सामाजिकता का उदय (Nayi Samajikta ka Uday)

Author: सतेंद्र कुमार (Satendra Kumar)
Publisher: Oxford University Press

Award Category: Hindi Non-Fiction

About the Book: 

गाँव बदल गए हैं। गाँवों का वह परिवेश बदल गया है जिसे हम देहात कहते हैं। इस बदलाव ने गाँवों में एक नई सामाजिकता निर्मित की है। यह किताब गाँव के इसी बदलाव को हमारे सामने रखती है। तकनीक ने तकलीफ बढ़ा दी है। तकनीक ने तकलीफ दूर कर दी है। किताब अपने छोटे-छोटे संदर्भों से इसकी पड़ताल करती है। नवें दशक के आर्थिक सुधारों के बाद गाँव और किसानी जीवन ने अपनी धमक खो दी। नयी अर्थव्‍यवस्‍था में शहर और शहरीकरण का बोलबाला हो गया। इस नये बनते-बिगड़ते गाँव की हमारे पास कोई मुक़म्मल तस्वीर नहीं रही। किताब में पिछले तीन दशकों में गाँव के विकसित होने या न होने, शहरनुमा बनने या न बनने और बदलने या न बदलने की समाजशास्त्रीय जाँच-पड़ताल की गई है।

Everyday life in contemporary rural India is characterized by an increased sense of mobility, inequality, and uncertainty. Ordinary villagers often find themselves caught between the promises and failures of democracy and development. This ethnographic study of the village of Kanpur (in Uttar Pradesh, north India) is an attempt to grasp everyday life in rural India. Drawing on descriptions of village life, interspersed with theoretical analyses, the author examines how ordinary people construct their own sense of their lives and their futures in everyday activities: working on farms, attending college, searching for non-farm employment, celebrating religious rituals, and dealing with local elections and democracy. The villagers confront growing economic and moral uncertainty; they creatively harmonize public discourse and local practice; and sometimes they resolve incoherence and unease through the use of irony. In so doing, they perform everyday village and caste ethics and re-create transient political, economic, and moral communities at a time of massive social dislocation. Satendra Kumar in this lucid book shows, in no uncertain terms, that villages in Uttar Pradesh and elsewhere have been and continue to be vibrant grounds for the production of culture, sociality, hope, politics, and persons. He also addresses anthropology's forfeiture of the village as a subject of study in an era of globalization.

About the Author: 

सतेंद्र कुमार इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में अध्यापन करतें हैं। दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डॉक्टरेट के बाद, वह लम्बे समय से पूर्वी तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछड़ी एवं अति पिछड़ी जातियों के राजनीतिकरण तथा लोकतंत्र के स्थानीय स्वरूप पर एथ्नोग्राफिक अध्ययन में जुटें हैं। उन्होंने गाँव -देहात, जाति के बदलते रूपों तथा युवाओं की राजनीति में बढ़ती भागीदारी पर भी लिखा है। समाजशास्त्रीय लेखन के अलावा वह कहनियाँ और कवितायें भी लिखतें हैं। वह सीएसडीएस- दिल्ली, कैलिफ़ोर्निया विश्वविधालय, बर्कले, जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय तथा लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में विजिटिंग फेलो रहें हैं।

Satendra Kumar is Assistant Professor, G.B. Pant Social Science Institute, University of Allahabad, Allahabad

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