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कोरोण्यकांड

 | Book Awards 2022 | Translated into Hindi

कोरोण्यकांड (कोरोण्यकांड)

यह कहानी है जंगल में लॉकडाऊन की। कोरोना के आतंक ने समूचे विश्व को उल्टा - पुल्टा कर दिया। शहरों को स्थानबद्ध कर दिया। पैसा और भौतिक उन्नति के पीछे पागलों की तरह दौडने वाले गतिमान इन्सानों के पैरों में मानो बेडियाँ डाल कर उन्हें अवरुद्ध कर दिया। स्पर्श को इतनी अहमियत देने वाला इन्सान स्पर्श से कतराने लगा। उसका भरोसा उठ गया स्पर्श से! विचार - विमर्श होने लगा। लोग कहने लगे कि मनुष्य को प्रकृति की ओर लौट जाना चाहिए। ‘कोरोण्यकांड’ की कहानी आपको ऐसे लोगों से मिलाती है, जो प्रकृति का ही एक हिस्सा है सदियों से! वे प्रकृति की गोद में पले - बढे हैं। वृक्ष - लताएँ - पशु - पंछी उनकी संस्कृति का अविभाज्य अंग हैं। इन लोगों को भी लॉकडाऊन के दिन देखने पडे। मराठी भाषा में लिखा गया शायद यह पहला उपन्यास है जो लॉकडाऊन की स्थिति और परिणामों के वास्तव रूप को उजागर करता है। अब हिन्दी अनुवाद के माध्यम से यह उपन्यासिका अपनी भाषिक सीमाओं से परे पहुँच कर एक नए रूप में आपके सामने प्रस्तुत है। This is a translated version of nicely-known original Marathi Novel: ‘Coronyakand’. It is a Lockdown Saga! Corona has collapsed human life and forced every human to rethink about Human-Nature relationship. This Story takes you away for a while and introduces you to its amazing tribal characters who are already living in their green dreams. Though they are saving nature and do not deserve a quarantine period of life, will Corona suddenly affect their thinking pattern? Or it will destroy their beliefs? How tribes will go thru this crucial phase of mother earth? Novelette, an experimental form of storytelling is being used here. Reading this very first Book of Marathi language on a theme Corona is an experience. Structure of this story is unique; experiment of symbolistic characters and linguistic prose-poetry combination make this Lockdown Saga different in every manner. Hindi Translation has been done by veteran Hindi Prof. Dr Vidya Sahasrabudhe. Book is truly enriched by illustrations, done by talented Rutuja Rajput. Therefore ‘Coronyakand’ written by Prajakta Gavhane can be a literary treat for sure!

Full Title: कोरोण्यकांड : अब हिन्दी में

Author: Prajakta Gavhane
Publisher: Notion Press
Translator: Dr. Vidya Sahasrabudhe
Original Language: मराठी

Award Category: Translated into Hindi
About the Book: 

This is a translated version of the nicely-known original Marathi Novel: ‘Coronyakand’. It is a Lockdown Saga! Corona has collapsed human life and forced every human to rethink about Human-Nature relationship. This Story takes you away for a while and introduces you to its amazing tribal characters who are already living in their green dreams. Though they are saving nature and do not deserve a quarantine period of life, will Corona suddenly affect their thinking pattern? Or it will destroy their beliefs? How tribes will go thru this crucial phase of mother earth?

Novelette, an experimental form of storytelling is being used here. Reading this very first Book of Marathi language on a theme Corona is an experience. The structure of this story is unique; the experiment of symbolistic characters and linguistic prose-poetry combination make this Lockdown Saga different in every manner. Hindi Translation has been done by veteran Hindi Prof. Dr Vidya Sahasrabudhe. The book is truly enriched by illustrations, done by talented Rutuja Rajput. Therefore ‘Coronyakand’ written by Prajakta Gavhane can be a literary treat for sure!

मराठी भाषा में लिखा गया शायद यह पहला उपन्यास है जो लॉकडाऊन की स्थिति और परिणामों के वास्तव रूप को उजागर करता है। अब हिन्दी अनुवाद के माध्यम से यह उपन्यासिका अपनी भाषिक सीमाओं से परे पहुँच कर एक नए रूप में आपके सामने प्रस्तुत है।

‘कोरोण्यकांड’ की कहानी आपको ऐसे लोगों से मिलाती है, जो प्रकृति का ही एक हिस्सा है सदियों से! वे प्रकृति की गोद में पले - बढे हैं। वृक्ष - लताएँ - पशु - पंछी उनकी संस्कृति का अविभाज्य अंग हैं। इन लोगों को भी लॉकडाऊन के दिन देखने पडे।

यह कहानी है जंगल में लॉकडाऊन की।

कोरोना के आतंक ने समूचे विश्व को उल्टा - पुल्टा कर दिया। शहरों को स्थानबद्ध कर दिया। पैसा और भौतिक उन्नति के पीछे पागलों की तरह दौडने वाले गतिमान इन्सानों के पैरों में मानो बेडियाँ डाल कर उन्हें अवरुद्ध कर दिया। स्पर्श को इतनी अहमियत देने वाला इन्सान स्पर्श से कतराने लगा। उसका भरोसा उठ गया स्पर्श से! विचार - विमर्श होने लगा। लोग कहने लगे कि मनुष्य को प्रकृति की ओर लौट जाना चाहिए।


About the Author: 

Prajakta Gavhane is born in Pune, India, studied in Jnana Prabodhini Gurukul where her writing got encouraged by the school. She has written Marathi fiction 'Ekdum Bindhast'(2014) and 'Koronyakand'(2020). Koronyakand is a lockdown Saga, that has also been translated into Hindi (in 2021) after its improbable reception in Marathi. Hindi Translation is done by notable Hindi translator Hon. Prof. Dr. Vidya Sahasrabudhe. The book is based on the corona pandemic and has swiped some genuine awards incl. the winner of 'Coimbatore Literary Awards' for Fiction 2021 and the 'Author Pages Prize for Best Women Writing' in 2021.

Prajakta's debut poetry album 'Kanherichi Phule' has received the 'Best Album of the Year' 2013 Award from Marathi Chitrapat Parivar. Her lyrical experiment of writing the 'Marathi Breathless' song got recognized by Limca Book of Records 2013 Edition.

She has completed her bachelor's and masters' degrees in the literature studies of German. Prajakta believes that this is the best time to look at Marathi literature from the global horizon. Storytelling is never enough; it must be experimented with making eBooks, audiobooks, translations available worldwide!


Excerpt: 

शहरवासियों के चित्र पहली बार देखे ‘बॉम्बे आर्ट गैलरी’ में। इस मायानगरी में कदम रखते ही मैं समझ गया कि अब सिर्फ हाथ से चित्र बनाने का जमाना खत्म हो चुका है। मेरे एक - एक चित्र से अलग - अलग आकार के कई पोस्टर्स बनाए गए थे। सडक के दुभाजकों से ले कर फिल्म के प्रीमियर तक जगह - जगह पर वे ही चित्र नजर आ रहे थे – वही हरे रंग, केवल उपयोजन अलग – अलग!

जाहिर था कि मेरे जैसे अनपढ व्यक्ति को अगर रंगों की दुनिया में पैर जमा कर खडा रहना हो, तो अथक मेहनत करनी होगी। सिखाने वाला कोई नहीं था, क्योंकि हर कोई प्रतियोगिता में शामिल था। फिर एक बार निरीक्षण की पैदाइशी देन मददगार साबित हुई। मैं समझ गया कि मेरे चित्र उन्हें इतने पसंद क्यों आए हैं। उनकी दुनिया मेरी दुनिया से बहुत अलग थी। मेरे चित्रों के साँवले चेहरे उजली हँसी से दमकते थे - उन्हें किसी मिलियन डॉलर लिपस्टिक की जरूरत नहीं थी। बाँस की टोकरियाँ बुनने वाली औरतें उन लोगों को अर्धनग्न और आकर्षक लगती थी। पर मेरे चित्रों में कभी भी गरीबी की नुमाइश नहीं होती थी - औरतों का पहनावा फटा – पुराना, मैला – कुचैला कभी भी नहीं होता था। जंगल में घूमफिर कर काम करते समय वे औरतें जो कपडे पहनती थीं वे चुस्त जरूर होते थे, पर आरामदेह होते थे! ताकद के काम करते समय झरने वाले पसीने को सम्हालने वाले होते थे। - मेरे चित्रों में अंकित ये बारीकियाँ शहरवासियों को हैरान कर देती थीं। उनके चित्रों में क्या था? - सिगरेट का धुआँ, आलिशान गाडियों की वजह से होने वाला प्रदूषण, बहती नदी के किनारे गरदन उठाकर मगरूरी में खडे कारखानों की धुआँ उगलती चिमनियाँ - वगैरह वगैरह! यह सब देखते - देखते जी ऊब गया था उनका। अगर बडी जल्दी हो चित्र बनाने की, तो फिर ऐसे ही चित्रों को ‘वास्तववादी’ नाम दे कर संतोष कर लेते थे। ‘जरा हटके’ चित्र बनाने की धुन में फिर दिखाने लगे खाली सडकें, द ड्रीम रोड, समुंदर पर बनाए गए हवाई पुल और कभी - कभी घर की चार दीवारों में कैद, सेल्फी के पीछे पागल लोग जो बस् खिडकी से दिखाई देने वाले एक मुट्ठी आसमान में चाँद को देखने के लिए तरस जाते थे! मैंने बंदर के साथ खेलने वाले छोटे बच्चे का चित्र बनाकर दिखाया, तो वह उन्हें ‘क्रेझी’ लगा। सपेरे की बीन पर डोलने वाले नाग का चित्र बनाया तो वह उन्हें ‘लाइव्हली’ लगा। चित्र में गाँव का मूँछ - मुँडासे वाला आदमी दाँतों से गन्ना उखाडते हुए दिखाया तो वह उन्हें ‘नेचर फ्रेंडली’ लगा! वे भी चित्र बनाते थे, मैं भी! पर उनकी दुनिया रूखीसूखी थी, मेरी हरीभरी! मेरी दुनिया खिलखिलाता झरना थी, तो उनकी दुनिया रुका हुआ पानी! मेरी दुनिया तो पहले से ही आत्मनिर्भर थी - बिना किसी के निर्देश के! उनकी दुनिया असंतुलन की खाई में लडखडा रही थी।


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